कुछ दिनों पहले काम के सिलसिले में मेरा अहमदाबाद जाना हुआ। शाम को काम से लौटते वक्त बेटी और पति के साथ कुछ सैर करते हुए बगीचों की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद उठाया और उबर टैक्सी से वापसी की। रास्ते में ट्रैफिक सिग्नल पर गाड़ी रुक गई मेरे बाई तरफ एक बहुमंजिला इमारत थी, जो की एक सोने व चांदी के आभूषणों की दुकान थी। उसकी चमक शाम के हल्के अंधेरे में देखते ही बनती थी। जब मेरी नज़र बाई तरफ गई तो देखा कि एक स्त्री घुटनों तक साड़ी पहने बड़ी सी साइकिल जो की माल ढोने में उपयोग होती है आकर मेरी खिड़की के बाहर रुक गई। उसकी साइकिल काफी लदी हुई थी। मैं बस उसे देखते ही रह गई संघर्ष से दमकता हुआ चेहरा कई सोने के चमकार से भी चमकीला था। शायद मेरी टकटकी लगाकर देखने का आभास उसे हो गया था। उसने मेरी तरफ देखा और शाम के ढलते हुए गुलाबी रंग के बादल जैसी प्यारी सी मुस्कान दी, मैं भी उसे देखकर मुस्कुरा दी। ट्रैफिक चल पड़ा और वह भी। उसके संघर्ष की चमक उसे आभूषण के दुकान के चमकते तेज को फीका कर गई। कितनी सुंदर होती है संघर्ष की चमक आत्मविश्वास की लालिमा। बस मुझे ऐसी स्त्री बनना पसंद है।
